वैदिक ज्योतिष और रत्न

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वैदिक का अर्थ होता है वेदों से संबंधित। ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्, होतारं रत्नधातमम्। दुनिया के सबसे पुराने ग्रंथ ‘ऋगवेद’ के इस पहले श्‍लोक में अग्‍नी देव की स्‍तुति के साथ यह कहा गया है कि अग्‍नी देव प्रसंन होकर रत्‍नों से विभुषित करते है। इस तथ्‍य को किसी प्रमाण की आवश्‍यक्‍ता नहीं है कि रत्‍नों का महत्‍व ‘ऋगवेद’ से पहले भी था।

भारत के सबसे पहले चिकित्‍सक चरक ने ‘चरक संहिता’ में औषधि के साथ-साथ मणि (रत्‍न) धारण को भी उपचार का शक्‍तिशाली तरीका बताया है। इतना ही नहीं प्रसिद्ध प्राचीन युनानी चिकित्‍सक ‘हिप्‍पोक्रेट’ ने कहा था कि ‘एक चिकित्‍सक जिसे ज्‍योतिष का ज्ञान नहीं है वह पूर्ण रूप से चिकित्‍सक कहलाने के योग्‍य नहीं है’।

वैदिक ज्‍योतिष के अनुसार ग्रहों का रत्‍नों से संबंध इस प्रकार है:

1: सूर्य के अच्‍छे प्रभावों के लिए माणिक धारण किया जाता है।

2: वैदिक ज्‍योतिष में चंद्रमा का संबंध मोती से माना जाता है, इसलिए चंद्रमा के अच्‍छे फल प्राप्‍त करने के लिए मोती धारण किया जाता है।

3: लाल मूंगे का संबंध मंगल से है। इसलिए मंगल के बुरे प्रभावों से बचने के लिए ज्‍योतिष मूंगा धारण करने की सलाह देता है।

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4: बुध ग्रह का संबंध पन्‍ना रत्‍न से माना जाता है। इसलिए पन्‍ना धारण कर बुध के अच्‍छे प्रभाव प्राप्‍त करने की सलाह वैदिक ज्‍योतिष में दी जाती है।

5: गुरू ग्रह का रत्‍न पुखराज है। वैदिक ज्‍योतिष के अनुसार पुखराज धारण कर गुरू के अच्‍छे प्रभाव प्राप्‍त किए जाते हैं।

6: शुक्र ग्रह का रत्‍न हीरा है और इसे धारण कर शुक्र के अच्‍छे प्रभाव प्राप्‍त होते हैं।

7: शनि ग्रह का रत्‍न नीलत है। नीलम धारण कर शनि के अच्‍छे प्रभाव प्राप्‍त किए जाते हैं।

8: राहू का रत्‍न गोमेद है और राहू के अच्‍छे प्रभाव को प्राप्‍त करने के लिए इसे धारण किया जाता है।

9: केतु से संबंधित रत्‍न लहसुनिया है। लहसुनिया धारण कर केतु के अच्‍छे फल प्राप्‍त करने की बात ज्‍योतिष ग्रंथों मे मिलती है।

नोट: नौ रत्‍नों को हमेशा ज्‍योतिषीय सलाह के बाद ही धारण करना चाहिए, अन्‍यथा ग्रहों की स्‍थति के अनुसार इनके अशुभ फलों के प्राप्‍त होने की संभावना भी होती है। रत्‍नों के विषय में किसी भी तरह की ज्‍योतिषीय सलाह के लिए हमें कॉल करें।

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